poems 7 February 2026 1 min read 6

बुत्त

पीड़ें छिम्बी-छिम्बी मजूसियें मिंधी-मिंधी ठोकरें घड़ी-घड़ी झोरें तुम्बी-तुम्बी में बनी गेआ इक बुत्त घाड़मा। औंदे-जंदे पारखी गलाई जंदे,च ‘बड़ा शैल मड़ा!’ पर! तिड़-तिड़ तिड़दी मेरी आन्दरें दे…

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Ashok Khajuria

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पीड़ें छिम्बी-छिम्बी 
मजूसियें मिंधी-मिंधी
ठोकरें घड़ी-घड़ी 
झोरें तुम्बी-तुम्बी
में बनी गेआ 
इक बुत्त घाड़मा। 

औंदे-जंदे पारखी 
गलाई जंदे,च
‘बड़ा शैल मड़ा!’

पर!
तिड़-तिड़ तिड़दी
मेरी आन्दरें दे अन्दरो-अन्दरी
कुरजदे अत्थरुंएं दी भला
कुस दिक्खी 
देवका ?
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